हिंदी साहित्य में डायरी का उद्भव और विकास

लेखक

  • Paramita Das Research Scholar, School of Law, Presidency University, Itgalpura, Rajanukunte, Yelahanka, Bengaluru ##default.groups.name.author##
  • Dr. Manindra Singh Hanspal Assistant Professor, School of Law, Presidency University, Itgalpura, Rajanukunte, Yelahanka, Bengaluru ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.71126/nijms.v2i5.132

सार

हिंदी साहित्य में आधुनिक काल के आने से मनुष्य जीवन साहित्य के निकट आ गया
है। जीवन से संघर्ष करते हुए लेखक ने यथार्थ की गहराई को अत्यधिक निकटता से
महसूस किया है। आधुनिक काल में गद्य जीवन की अभिव्यक्ति का साधन बन गया
है। आधुनिक काल में जीवंत आभास कराने वाली अनेक नई विधाओं का विकास हुआ
है। भारतेंदु युग से गद्य का साहित्य में व्यवस्थित रूप से सूत्रपात हुआ, धीरे-धीरे
गद्य की विविध विधाओं का विकास हुआ। आज के वर्तमान भौतिकवादी, सामाजिक
परिवेश में जैसे-जैसे वैज्ञानिक व तकनीकी उन्नति होती गई, वैसे-वैसे नई विसंगतियों
का जन्म हुआ। आदमी, आदमी से कटता चला गया। वह एकाकी बोध की स्थिति में
जीवन व्यतीत करने को मजबूर हो गया। इस समस्या ने अभिव्यक्ति के नए रूपों को
अपना सहारा बनाया। आत्मकथा, यात्रा-वृत्तान्त, संस्मरण, रिपोर्ताज, रेखाचित्र,
इन्टरव्यू, पत्र और जीवनी आदि अनेकों गद्य-विधाओं के साथ साहित्य में एक विशेष
विधा विकसित हुई, जिसे 'डायरी' नाम दिया गया। प्रस्तुत शोध पत्र में लेखक ने हिंदी
साहित्य में डायरी के उद्भव और विकास पर शोध करने का प्रयास किया है।

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