उत्तराखंड के संस्कृत महाविद्यालयों में संचालित शिक्षा व्यवस्था का समीक्षात्मक अध्ययन

लेखक

  • डॉ.ज्ञानेन्द्र कुमार असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ##default.groups.name.author##

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https://doi.org/10.71126/nijms.v1i2.104

सार

भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे संस्कृतं संस्कृतिस्तथा’ संस्कृत भाषा, न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत की संग्राहिका है प्रत्युत् यह भारतीय आध्यात्मिकता की प्रवाहिका भी है। संस्कृत के इस माहात्म्य को देखते हुए ही ‘ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ' में संस्कृत भाषा के संरक्षण एवं शिक्षण पर काफी बल दिया है। इसमें संस्कृत भाषा की पाण्डुलिपि संरक्षण से लेकर संस्कृत अध्ययन अध्यापन तक सुझाव दिए गए हैं। ऐसा नहीं है कि इस नीति से पूर्व संस्कृत भाषा अध्ययन-अध्यापन हेतु प्रयास नहीं किये जा रहे थे इससे पूर्व भी केंद्र और सरकारों द्वारा संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन हेतु निरंतर प्रयास किये जाते रहे हैं इसी सन्दर्भ में अगर बात करें, उत्तराखंड सरकार द्वारा संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन के लिए किये जा रहे प्रयासों की तो राज्य में 90 से ज्यादा संस्कृत विद्यालयों और महाविद्यालयों की स्थापना की गई है।  इसके साथ ही राज्य द्वारा संस्कृत भाषा में अनुसंधान हेतु 2005 में हरिद्वार में एक संस्कृत विश्वविद्यालय की भी स्थापना की गई है। राज्य में संस्कृत भाषा के प्रचार और प्रसार के लिए उत्तराखंड के पांच गाँवों को ‘आदर्श संस्कृत ग्राम’ के रूप में घोषित किया गया है। 2010 में राज्य ने संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा भी दिया है। इतने प्रयासों के बाद, क्या उत्तराखंड में जनसामान्य में संस्कृत भाषा का प्रचार प्रसार संभव हो पाया है? इसके अतिरिक्त क्या संस्कृत महाविद्यालयों में संचालित शिक्षा व्यवस्था छात्रों को अध्ययन हेतु अभिप्रेरित करने में समर्थ हो पा रही है? इत्यादि प्रश्नों की चर्चा प्रस्तुत शोधपत्र में  की गयी है

मुख्य शब्द : राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, मानवीय संसाधन, भौतिक संसाधन, संस्कृत भाषा।

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प्रकाशित

2025-11-30